‘…और हम बुलेट के मालिक हो गए’

सुशील झाबी बी सी में कार्यरत हैं. उनकी शिक्षा जादूगोड़ा (झारखण्ड), जे एन यू और IIMC, दिल्ली में हुई. उनसे sushilkumar.jha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

Sushil Jha

कभी सोचा नहीं था कि बुलेट के बारे में लिखूंगा क्योंकि बुलेट बीवी जैसी है और बीवी के बारे में कोई लिखता नहीं. सब प्रेमिका के बारे में लिखते हैं. बीवी हमेशा taken for granted लेकिन ज़रुरी. बुलेट मेरे जीवन का हिस्सा है मेरी बीवी की तरह.

एक और बात है. दुनिया में जितने लोग भी मोटरसाइकिल चलाते हैं वो सब बुलेट से स्नेह करते हैं. प्रेम नहीं लिख रहा हूं क्योंकि जो प्रेम करता है वो फिर बुलेट प्राप्त कर ही लेता है. येन केन प्रकारेण. और जिसके पास बुलेट है वो फिर लिखने भी लगता है कि कहां गए क्या घूमे. कितना मजा किया.

एक दो नहीं कम से कम दस बारह किताबें ज़रुर होंगी. डेढ दो सौ ब्लॉग भी होंगे और कुछ नहीं तो यहां वहां हज़ारों डायरियों के पन्ने ज़रुर भरे होंगे. तो फिर इसमें हम क्या ही लिखेंगे पिद्दी के शोरबे की तरह.

फिर भी किसी मित्र ने आग्रह किया है, जिससे मैं स्नेह करता हूं, तो लिख रहा हूं. बुल्लेट या रॉयल एनफील्ड की पहली याद बचपन की है. भड़ भड़ भड़ भड़ की आवाज सुनते ही कॉलोनी की आधी महिलाओं के दिल उनके हलक में आ जाते थे और वो कहती थीं आ गया सत्तार खान. आ गए गफूर मियां और फिर आ गया…….खोसला…

सत्तार खान की बुलेट कम से 500 किलो की होगी. सोफा सेट जैसी सीट जिसका गद्दा नीले रंग का था. पीछे पीठ टिकाने की पूरी जगह. हैंडल में कैसेट की काली रील काट कर लगी जो हवा में उड़ती थी. हटटे कट्टे और बलशाली सत्तार मियां हमेशा पठानी सूट में रहते और कई शादीशुदा औरतें उन पर जान छिड़कती थीं.

जब वो कॉलोनी से जाते तो कई औरतों के चेहरे उतर जाते. कुछ साल बाद पता चला कि सत्तार मियां सोने की तस्करी में पकड़े गए और जेल चले गए. सत्तार की बुलेट अब जंग खाती है हमारे थाने में. सत्तार की रेपुटेशन मिथकीय हो चुकी है. एक थे सत्तार मियां.

गफूर भाई मोटे तगड़े थे और शरीर पर सफेद दाग के निशान. सत्तार के बड़े भाई लेकिन नौकरीपेशा. उनकी बुलेट थी हरे रंग की. आवाज़ बिल्कुल वही. भड़ भड़ भड़ भड़ लेकिन सत्तार वाली कशिश नहीं थी उसमें. एक धीर-गंभीरता मानो कोई सयाना चला रहा हो. पैसा उनके पास भी था लेकिन वो पठानी सूट सिर्फ ईद वाले दिन पहनते थे. उनके हाथों में बुलेट किसी खिलौने की तरह लोटती. गफूर चाचा ने कई बार टंकी पर बिठाया. टंकी क्या लगता था कि पृथ्वी है अंडाकार. हाथ बढ़ाकर कर हैंडल पकड़ते तो लगता था दुनिया मेरी मुट्ठी में.

खोसला परजीवी था. उसकी बुलेट थी काले रंग की और लोग कहते थे खोसला का दिल भी काला है. खोसला पंजाब के थे लेकिन न तो दाढ़ी रखते और ही पगड़ी. कड़ा पहनते थे और अरिया पंजाबी कहलाते थे. वो जो भी होता है.कॉलोनी के घरों में शॉल बेचते बेचते खोसला ने कंपनी में नौकरी पाई और फिर सूद पर पैसा चलाते चलाते साहबों के घर तक पहुंचे और फिर अपनी बुलेट तक. विशालकाय टंकी. चौड़े हैंडल, बड़ी सी सीट और किक भी थोड़ी ज़रुरत से अधिक लंबी. साइड स्टैंड ही लगाते थे खोसला. गफूर और सत्तार वाली ताकत नहीं थी. आवाज़ बुलेट की थोड़ी कर्कश. भिड़ भिड़ भिड़ भिड़. मानो सूद मांगने जा रही हो. जब तक सूद चला बुलेट चली. सूदखोरी बंद हुई बुलेट भी खड़ी हो गई.

कर्ज के तले हम भी दबे थे तो खोसला के बुलेट को अधिक अच्छे से पहचानते थे. जब खड़ी हो गई तो दिल में ये तमन्ना थी. जब पैसा होगा तो यही गाड़ी खरीदेंगे. बिना सूद के चलाएंगे.

दुर्गा पूजा में एक दोस्त अपने चाचा की बुलेट ले कर आया था.लाल रंग की 500 सीसी. रॉयल एनफील्ड. पूजा में गाड़ी हो तो लकड़ियां पट जाती हैं ऐसी गफलत हमें भी थी. पहली बार ज़िंदगी में मक्खन बुलेट के लिए ही लगाया था और समझिए, गिड़गिड़ाए कि यार एक बार चलाने दो. वो दिन है और आज का दिन है. नशा वैसा ही है बरकरार.

फिर नौकरी…पढ़ाई..करियर और न जाने क्या क्या. दिल्ली में बुलेट कम दिखती थी 98-99 में. पता नहीं क्यों…जहां पढ़ते थे वहां एक बुलेट थी. नंबर था. HIL 1. भूरे रंग की. ज़बर्दस्त. उसे घंटो खड़े होकर निहारते और तय करते कि साली एक किक में स्टार्ट कैसे हो जाती है. HIL 1 का मालिक बाद में आईएएस हो गया और हम पत्रकार हो गए.

पहली, दूसरी, तीसरी तनख्वाह में बुलेट तो क्या साइकिल खरीदना भी संभव नहीं था.एक बार बहुत जोर देकर हीरो होंडा खरीदने गए लेकिन रास्ते में एक बुलेट सवार को देख कर इरादा बदल दिए…बैंक वाला गरियाता रहा कि चेक बनवा कर लोन नहीं लिए.

2006. अप्रैल की दो तारीख. चिंटू मैं और तबरेज़. रॉयल एनफील्ड का शो रुम. कीमत 69,750. रंग काला. तब एटीएम से एक दिन में सिर्फ 25 हज़ार रुपए निकल सकते थे और कार्ड से पेमेंट संभव नहीं था. 25 दिए लेकिन गाड़ी मिली नहीं. दूसरे दिन सुबह बैंक खुलने से पहले बैंक में और शोरुम खुलने से पहले नकद नोटों के साथ शोरुम में थे. पहली किक चिंटू ने मारी और हम बुलेट के मालिक हो गए.

डरे पहली बार चलाने में. पिंगुआ ने कहा डरना नहीं है…गर्लफ्रेंड थोड़ी है…इ उससे बढ़िया चीज़ है. मारो किक. जेएनयू के रिंग रोड पर पहली बार अपनी बुलेट चलाई थी तो हवा के थपेड़ों में सत्तार, गफूर और खोसला के चेहरे दिखाई दिए. रॉयल एनफील्ड के वो सारे मॉडल सामने घूम गए जो इंटरनेट पर पिछले कई सालों में देखते रहे थे.

पहली बार ऑफिस गए बुलेट पर चढकर तो सीनियर लोगों ने कहा तुम …च…हो..पगला गए हो….क्या मूर्खता है…आदि आदि. लटके मुंह के साथ बैठे थो महिला बॉस ने पूछा क्या बात है मुंह क्यों लटका है, तुम तो आज बुलेट पर आने वाले थे न. मैंने कहा, हां आया बुलेट ही हूं लेकिन सब बोल रहे हैं कि मुझे नहीं खरीदनी चाहिए. बॉस बोली-जिसने कहा है उनके पास जाओ और बोलो….मैंने आपको बुलेट खरीदने की सूचना दी थी..आपकी राय नहीं मांगी थी.मैं गया और सीनियरों से बोला…सुनिए मैंने आपको बताया था कि मैंने बुलेट खरीदी है…आपकी राय नहीं मांगी थी. सीनियर चुप. बॉस बोली, अब चलो खान मार्केट घुमा कर लाओ. मैं और मेरी बॉस खान मार्केट से चॉकलेट खरीद कर लाए और सारे सीनियरों को खिलाया गया फिर सब बोले. कमाल है तुम आदमी नहीं बुलेट हो.

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