‘जवानी भी मेरी लौटा दो मेहर के साथ’

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

हिन्दुस्तान में सिनेमा का सौंवें साल की पहली तारीख़ कुछ भी हो सकती है. 4 अप्रैल, जब राजा हरिश्चंद्र के पोस्टरों से बंबई की दीवारें सजाई गयी थीं, 21 अप्रैल, जब दादासाहेब ने यह फिल्म कुछ चुनिन्दा दर्शकों को दिखाई, या फिर 3 मई, जब इसे आम जनता के लिए प्रदर्शित किया गया. ख़ैर, सिनेमा की कोई जन्म-कुण्डली तो बनानी नहीं है कि कोई एक तारीख़ तय होनी ज़रूरी है. अभी यह लिख ही रहा हूँ कि टीवी में एक कार्यक्रम के प्रोमो में माधुरी दीक्षित पाकीज़ा के गाने ‘ठाड़े रहियो वो बांके यार’ पर नाचती हुई दीख रही हैं. अब मीना कुमारी का ध्यान आना स्वाभाविक है. क्या इस साल हम यह भी सोचेंगे कि इस ट्रेजेडी क्वीन के साथ क्या ट्रेजेडी हुई होगी? आख़िर पूरे चालीस की भी तो नहीं हुई थी. इतनी कामयाब फिल्मों की कामयाब नायिका के पास मरते वक़्त हस्पताल का ख़र्चा चुकाने के लिए भी पैसा न था. कमाल अमरोही कहाँ थे? कहाँ थे धर्मेन्द्र और गुलज़ार? क्या किस्मत है! जब पैदा हुई तो माँ-बाप के पास डॉक्टर के पैसे चुकाने के पैसे नहीं थे. चालीस साल बंबई में उसने कितना और क्या कमाया कि मरते वक़्त भी हाथ खाली रहे. माहजबीन स्कूल जाना चाहती थी, उसे स्टूडियो भेजा गया. वह सैयद नहीं थी, इसलिए उसके पति ने उससे बच्चा नहीं चाहा और एक वह भी दिन आया जब उसे तलाक़ दिया गया. क्या सिनेमा के इतिहास में मीना कुमारी के लिए सजनी भोपाली का यह शेर भी दर्ज होगा:
तलाक़ दे तो रहे हो गुरूर- ओ – कहर के साथ
मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे महर के साथ

क्या कोई इतिहासकार इस बात की पड़ताल करेगा कि मधुबाला मरते वक़्त क्या कह रही थी? उसे तो तलाक़ भी नसीब नहीं हुआ. उसके साथ ही दफ़न कर दिया गया था उसकी डायरी को. कोई कवि या दास्तानगो उस डायरी के पन्नों का कुछ अंदाज़ा लगाएगा? अगर बचपन में यह भी मीना कुमारी की तरह स्टूडियो न जा कर किसी स्कूल में जाती तो क्या होती उसकी किस्मत! बहरहाल वह भी मरी, तब वह बस छत्तीस की हुई थी. वक़्त में किसी मुमताज़ को संगमरमर का ताजमहल नसीब हुआ था, इस मुमताज़ के क़ब्र को भी बिस्मार कर दिया गया. शायद सही ही किया गया, देश में ज़मीन की कमी है, मुर्दों की नहीं.

कवि विद्रोही एक कविता में पूछते हैं: ‘क्यों चले गए नूर मियाँ पकिस्तान? क्या हम कुछ भी नहीं लगते थे नूर मियाँ के?’ मैं कहता चाहता हूँ कि माहजबीन और मुमताज़ पकिस्तान क्यों नहीं चली गयीं, शायद बच जातीं, जैसे कि नूरजहाँ बचीं. तभी लगता है कि कहीं से कोई टोबा टेक सिंह चिल्लाता है- ‘क्या मंटो बचा पकिस्तान में?’ मंटो नहीं बचा. लेकिन सभी जल्दी नहीं मरते. कुछ मर मर के मरते हैं. सिनेमा का पितामह फाल्के किसी तरह जीता रहा, जब मरा तो उसे कन्धा देने वाला कोई भी उस मायानगरी का बाशिंदा न था. उस मायानगरी को तो उसके बाल-बच्चों की भी सुध ना रही. कहते हैं कि यूनान का महान लेखक होमर रोटी के लिए तरसता रहा लेकिन जब मरा तो उसके शरीर पर सात नगर-राज्यों ने दावा किया.

हिन्दुस्तान के सिनेमाई नगर-राज्यों ने फाल्के की तस्वीरें टांग ली हैं. पता नहीं, लाहौर, ढाका, सीलोन और रंगून में उसकी तस्वीरें भी हैं या नहीं. दस रुपये में पांच फिल्में सी डी में उपलब्ध होने वाले इस युग में फाल्के का राजा हरिश्चंद्र किसी सरकारी अलमारी में बंद है.

बहरहाल, ये तो कुछ ऐसे लोग थे जो जिए और मरे. कुछ या कई ऐसे भी हैं जिनके न तो जीने का पता है और न मरने का. नज़मुल हसन की याद है किसी को? वही नज़मुल, जो बॉम्बे टाकिज़ के मालिक हिमांशु रॉय की नज़रों के सामने से उनकी पत्नी और मायानगरी की सबसे खूबसूरत नायिका देविका रानी को उड़ा ले गया था. एस मुखर्जी की कोशिशों से देविका रानी तो वापस हिमांशु रॉय के पास आ गयीं, लेकिन नज़मुल का उसके बाद कुछ अता-पता नहीं है. मंटो-जैसों के अलावा और कौन नज़मुल को याद रखेगा. ख़ुद को ख़ुदा से भी बड़ा किस्सागो समझने वाला मंटो दर्ज करता है: ‘और बेचारा नज़मुलहसन हम-जैसे उन नाकामयाब आशिक़ों की फ़ेहरिश्त में शामिल हो गया, जिनको सियासत, मज़हब और सरमायेदारी की तिकड़मों और दख़लों ने अपनी महबूबाओं से जुदा कर दिया था’.

मंटो होता तो क्या लिखता परवीन बॉबी के बारे में? बाबुराव पटेल कैसे लिखते भट्ट साहेब के बारे में? किसी नायिका को उसकी माँ के कमरे में उनके जाने की ज़िद्द को दर्ज करने वाले अख्तर-उल ईमान कास्टिंग काउच को कैसे ब्यान करते? है कोई शांताराम जो अपनी हीरोईनों के ड्रेसिंग रूम में अपने सामने कपड़े उतार के खड़े हो जाने का ज़िक्र करे? इतिहास फ़रेब के आधार पर नहीं लिखे जाने चाहिए. इतिहास संघ लोक सेवा आयोग के सिलेबस के हिसाब से नहीं बनने चाहिए. इतिहास की तमाम परतें खुरची जानी चाहिए. वह कोई ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ ब्रांड का नेशनल अवार्ड नहीं है जिसे दर्जन भर लोग नियत करें.

 

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