गुजरात हाई कोर्ट का निर्णय हिन्दी-दंभ पर स्वाभाविक प्रतिक्रिया है..!

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यलय में शोधार्थी हैं. अवधी के लोकप्रिय पोर्टल अवधी कै अरघान के संचालक अमरेन्द्र से amrendratjnu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

अमरेन्द्र नाथ

गुजरात हाईकोर्ट की एक केस की सुनवाई में जज ने याचिकाकर्ता की दलील का निपटारा करते हुये कहा कि “याचिकाकर्ता जिस इलाके से आते हैं, वहां गुजराती प्रयोग में लाई जाती है। नोटिफिकेशन में प्रयोग की गई हिन्दी भाषा उनके लिए विदेशी भाषा है। आमतौर पर वहां हिन्दी नहीं गुजराती ही बोली जाती है। और, इसी तरह से स्टेट गर्वनमेंट के प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा भी गुजराती में ही दी जाती है”। बात है २००६ की, जब एक सूचना को हिन्दी में निकालकर एनएचएआई (नैशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ने 8डी नैशनल हाइवे की मौजूदा दो लेन को चौड़ा करके चार लेन में बदलने की योजना बनाई थी। इस सूचना को जूनागढ़ और राजकोट के किसान हिन्दी में होने के कारण नहीं समझ पाए थे, फिर एनएचएआई के इस नोटिफिकेसन की क्या वैधता, इसलिए उन्होंने अपनी इस जेनुइन माँग को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

यहाँ बहुत संभव है कि कोई हिन्दी के साथ ‘विदेशी भाषा’ के शाब्दिक व्यवहार को ही भुनने लगे। गौरतब है कि जज ने ‘विदेशी‘ शब्द हिन्दी के वहाँ(गुजरात) की जमीन की न होने के कारण, संप्रेषित न होने के कारण, वहाँ की जनभाषा न होने के कारण कहा है। इतना ही है इस संदर्भ में विदेशी का अर्थ। यह तो सहजबोध का मामला है कि हिन्दी कोई योरप-फारस की भाषा नहीं है।

न्यायालय के इस निर्णय में कुछ भी क्षोभ करने वाला नहीं है। निपट निरक्षर के सामने जाइये हिन्दी बोलिये गाँव में, वह पीठ पीछे कहेगा, ‘अंग्रेजी बूकत रहे’! सवाल हिन्दी विरोध का नहीं है, सवाल है कि हिन्दी के राष्ट्र-राजभाषी उन्माद में हम इन जीवित भाषाओं को क्यों मारने में लगे हैं। हिन्दी संपर्क भाषा के रूप में स्वतः फैले तो मेरा कोई विरोध नहीं है लेकिन जबरिया एकैडमिक झूठ और साम्राज्यवादी दंभ में इसको थोपना अत्यन्त घातक है, यह अकारण नहीं है कि ब्रज-भोजपुरी-अवधी-मैथिली…आदि की गौरवशाली साहित्यिक परंपराएँ हिन्दी के आने के बाद गला घोट के मार डाली गयीं, मातृभाषियों को इतनी कीमत चुकानी पड़ी! आखिर क्यों? जब तक कोई गरियाये न, तमिल भाइयों जैसा विरोध न करे तब तक बात समझ में नहीं आ्ती? यह जूनागढ़ के किसानों की आवाज है, कोर्ट ने जो कहा सही कहा, हिन्दी विभाग के गद्दार प्रोफेसरों से अलग, थुलथुल हिन्दी राष्ट्रवाद से अलग, झूठे एकैडमिक दंभ से अलग! मैं गुजरात हाई कोर्ट के इस निर्णय का तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।

हिन्दी विभाग के प्रफेसरों के संबंध में गद्दार शब्द मैने किसी उद्धत स्वभाव के चलते नहीं कहा है। इसकी भी वजह है। एकेडमिक का मुख्य लक्ष्य होता है, सत्यानुसंधान। लेकिन भाषा के मसले में हिन्दी विभागों ने मिथ्या प्रचार शुरू से ही रोपा है, उसकी फसल काट रहे हैं। हिन्दी विभागों और हिन्दी एकेडमीशिया ने आरंभ से ही उत्तरभारत की अनेक स्वतंत्र भाषाओं को अपनी ‘बोली’ कह कर उनका स्वतंत्र विकास होने से रोक दिया। दो झूठे प्रचार खास तौर पर किये गये, १-हिन्दी राष्ट्रभाषा है, और २- हिन्दी पूरे उत्तर भारत की मातृभाषा है। परिणामतः उत्तर भारत की भाषिक समृद्धि और वैविध्य विनष्ट हुआ। कुछ भाषाएँ खत्म होने को हैं, कुछ जैसे तैसे बची हैं, और कुछ प्रतिरोध में आ रही हैं। हिन्दी विभागों में भाषाविज्ञान नहीं के बराबर पढ़ाया जाता, संभव है यह राजनीतिक निर्णय हो, इस वजह से यह गफलत आराम से ढोयी जाती है कि अवधी-ब्रज-भोजपुरी-राजस्थानी-छत्तीसगढी-मैथिली..आदि हिन्दी की बोलियाँ हैं। जबकि लिंग्विस्टिक्स इन्हें स्वतंत्र भाषाएँ मानता है। इस सत्य को आप परीक्षाओं में लिख दें तो नंबर काट लिया जायेगा। इंटर्ब्यू में बोलें तो आपका चयन नहीं होगा। एक तरफ तो इन सभी स्वतंत्र भाषाओं को हिन्दी की खेती कहेंगे दूसरी तरफ इनके ग्रामर, शब्दकोश, कवियों को हिन्दी में हेयता-हीनता का प्रमाण मानेंगे। जब हिन्दी में कुछ नहीं होता, जब हिन्दी के अतीत की झूठी रेखा खींचनी होती है, तो लोकभाषाओं के कवियों को अपना कह देते हैं और आधुनिक काल के इन्हीं भाषाओं के कवियों को दूध पर पड़ी मक्खी की तरह बाहर फेक देते हैं। हिन्दी में ‘जनवाद’ खूब झोंका जाता है, एलीट शौक की तरह, पर जनभाषा क्या होती है, यह भी आज तक नहीं समझ पाया गया। जिन विद्वानों ने हिन्दी से अलग राय रखी कि ये ‘बोलियाँ’ नहीं भाषा हैं, उनकी बात को हिन्दी विभाग पढ़ाता भी नहीं है। एक सतही भाववाद का लाभ लिये हिन्दी का लोकभाषाओं पर अकादमिक साम्राज्य स्थापित किया गया है। इन स्थितियों में कहीं विरोध के स्वर आयें और हिन्दी के लिये ‘विदेशी भाषा’ का उक्ति-योग जुड़ जाए तो आश्चर्य क्या भला!

ऊपर मैने हिन्दी के अकादमिक तंत्र का जिक्र किया है। कारण है कि समाज की दिशा-दशा में इन ज्ञानीजनों के ज्ञान-तंत्र की और ज्ञान की अच्छी खासी भूमिका होती है। जो सत्य दिखाना चाहिये था, वह नहीं दिखाया गया, एक अलग ढर्रा अख्तियार की गयी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हिन्दी न तो कभी सबकी हो पायी और न ही बहुतेरी लोकभाषाएँ पनप सकीं। हिन्दी की जगह अंग्रेजी आने को है। अगर संपर्क भाषा का ही तर्क हो तो अंग्रेजी हिन्दी से भी अधिक बेहतर है, दक्षिण भारत और विश्व से संपर्क के लिहाज से। पर लोकभाषाएँ तो गरीब-गुर्बा मजदूर में हैं और रहेंगी। अनीति यही है कि इनकी इन भाषाओं को नोटिस न करना, इनमें नोटिफिकेशन न देना।

विगत समय में हिंग्लिश की पैरोकारी हुई है। विदित हो कि यह हिंग्लिश भी लोकभाषियों की जुबान नहीं है, यह उसी संपन्न निर्णायक मध्यवर्ग की जुबान है जिसकी जुबान हिन्दी रही है और वर्तमान में हिंग्लिश है। संभव है भविष्य में इसकी जुबान अंग्रेजी हो और यह अंग्रेजी की पैरोकारी करे। यह हिन्दी-हिंग्लिश के नाम पर बवाल भले काटे लेकिन अपने बच्चे को अंग्रेजी में ही पढ़ाता है, इसका सुनहरा भविष्य अंग्रेजी आँखो से देखता है! इसके निर्णय जनमन नहीं बल्कि इसकी अपनी सुविधा के अनुसार रहे हैं, इसीलिये इसे कभी उत्तरभारतीय लोकभाषाओं का दर्द नहीं समझ में आया। उल्टे मजदूरों-गरीबों की बोली को गँवारू कह कर हीनता का भाव भरता रहा। राजस्थानी और भोजपुरी का अपनी सांवैधानिक पहचान के लिये आगे आना इस हीनता-बोध को अपने ढंग से जबाब दे रहा है। देर से ही सही पर सही पहल है यह।

गुजरात हाईकोर्ट के इस फैसले में हिन्दी-तंत्र की उस सर्वग्रासी मानसिकता का प्रत्युत्तर भी है जिसने देशभर में हिन्दी संस्थान बनाये लेकिन यह नहीं देखा कि उन जगहों की भी भाषा है कोई, उसकी भी पहचान होनी चाहिये। हिन्दी वाले चाहे कि हिन्दी सुदूर दक्षिण पूरा भारत पढ़े-बोले लेकिन खुद उन भाषाओं से कभी स्नेह नहीं किया। यही वजह है कि गोपालाचारी जो कभी हिन्दी हित में लगे थे वे हिन्दी से हट तमिल की वकालत में गये। उन्होंने उचित ही किया। इसी समय हिन्दी की तरफ से अपना यशोगान करते हुये और यह दिखाते हुये कि हिन्दी कितनी महान भाषा है, दुनिया भर की छद्म घोषणाएँ हुईं। यथार्थ छद्म घोषणाओं से नहीं बदलता। विसंगतियाँ भविष्य में और भी दिखेंगी ही।