सीरिया की क्रांति सुन्नी और शिया सम्प्रदायों का संघर्ष नहीं है: फ़दवा सुलिमान

अरब के तानाशाहों ने क्रांति की आंधी से अपनी सत्ता बचाने के लिये अरबी के समाज के कबीलाई और सांप्रदायिक सामाजिक बुनावट को भुनाने की पूरी कोशिश की है. अपने आत्म-सम्मान और अधिकार की मांग कर रहे लोगों को कहीं कट्टरपंथी, कहीं सुन्नी, कहीं शिया, कहीं इस कबीले का तो कहीं उस कबीले का कहा गया. सीरिया के बशर अल-असद ने सड़कों पर आज़ादी के नारे लगाने वाले लोगों को कट्टरपंथी सुन्नियों का गिरोह कहा और अपने पीछे अल्वाईत शिया समुदाय को लामबंद करने की कोशिश की. बशर इसी समुदाय से आते हैं और यह सीरिया का एक अल्पसंख्यक समुदाय है लेकिन सत्ता के महत्वपूर्ण पदों पर इसी समुदाय के लोगों का कब्ज़ा है. विद्रोह को गृह-युद्ध की शक्ल देने के लिये और शिया समुदाय का समर्थन लेने के लिये बशर ने ऐसी कहानियाँ भी बनायीं जिसमें कहा गया कि सीरिया में अल्वाईतों का नर-संहार किया जा रहा है. हालांकि सच यह नहीं था.

मार्च से शुरू हुआ यह विरोध शुरू में बिल्कुल शांतिपूर्ण था लेकिन सरकार के भयावह दमन ने उसे भी कहीं-कहीं हिंसक बना दिया. चूंकि अल्वाईतों का एक हिस्सा तानाशाही का समर्थक है और सत्ताधारी बा’थ पार्टी तथा सरकारी पदों पर इस समुदाय का वर्चस्व है, इस वज़ह से हिंसक हमलों के वे शिकार बने. सीरियाई सेना का जब एक हिस्सा विद्रोह कर क्रांति के साथ आ गया तो ऐसी घटनाओं की संख्या और तीव्रता बढ़ गयी. लेकिन इसे कहीं से भी गुटीय संघर्ष की संज्ञा नहीं दी सकती. बशर की सत्ता के द्वारा गढ़े गए इस झूठ को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब अल्वाईत समुदाय से सम्बन्ध रखने वाली अदाकारा फ़दवा सुलिमान क्रांति के पक्ष में आ खड़ी हुईं.

दमिश्क में रहने वाली सुलिमान सीरियाई रंगमंच और टेलीविज़न की जानीमानी कलाकार हैं. क्रांति के शुरुआत से ही वह बशर और उनके दमन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं. लेकिन सीरिया की सत्ता और जनता को तब अचम्भा हुआ जब वे विद्रोह के केंद्र बने होम्स शहर के रुढ़िवादी सुन्नी मोहल्ले में हो रहे विरोध-प्रदर्शन के मंच से नारे लगाती हुई देखी गयीं. अल जज़ीरा के अरबी चैनल पर इसे दिखाए जाने के कुछ समय बाद ही सुलिमान का भाई सरकारी चैनल पर आया और यह घोषणा की कि उसने और उसके परिवार ने सुलिमान से अपना सम्बन्ध ख़त्म कर दिया है. सुलिमान के अनुसार, ख़तरे से आगाह होने के बाद भी उन्होंने प्रदर्शनों में हिस्सा इसलिए लिया ताकि वह लोगों को यह बता सकें कि सभी अल्वाईत बशर के साथ नहीं है और विरोध कर रहे लोग कट्टर इस्लामवादी या हथियारबंद आतंकवादी नहीं हैं. फ़िलहाल सुलिमान बशर के निशाने पर हैं और भूमिगत हैं. किसी अनजान जगह से उन्होंने ल जज़ीरा चैनल को साक्षात्कार दिया है जिसका अनुवाद दिया जा रहा है. -प्रकाश के रे.

अल जज़ीरा: होम्स जाने और सरकार-विरोधी प्रदर्शन में हिस्सा लेने के पीछे आपका उद्देश्य क्या था?
सुलिमान: होम्स शहर की घेराबंदी कर दी गयी है, वहाँ शहीदों की संख्या बहुत अधिक है और टैंकों ने शहर के विभिन्न ईलाकों के बीच संपर्क काट दिया है. सीरिया की सत्ता लोगों के बीच सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश कर रही है. इन कारणों से मुझे गोलियों की आवाज़ और टैंकों की मौजूदगी से घिरे होम्स शहर जाना पड़ा.

मैं बस इतना कहने के लिये वहाँ जाना चाहती थी कि हम सब सीरियाई एक हैं. मैं सत्ता के बकवास को ख़ारिज़ करना चाहती थी और यह जताना चाहती थी कि सीरिया में कोई गुटबाजी नहीं है. उस झूठ को रोकना चाहती थी कि विरोध करने वाले हथियारबंद गिरोह, विदेशी एजेंट या अतिवादी इस्लामपरस्त हैं.

अल जज़ीरा: अल जज़ीरा पर आपके विरोध के दृश्य प्रसारित होने के बाद आपकी ज़िंदगी में क्या बदलाव आए हैं? हम जानते हैं कि टेलीविज़न पर आकर आपके परिवार ने आपसे किनारा करने की घोषणा की है.
सुलिमान: मुझे पता था कि होम्स आने पर मुझे या तो मार दिया जायेगा या गिरफ़्तार कर लिया जायेगा. मेरी ज़िंदगी ख़तरे में है. सुरक्षा दस्तों ने मेरी तलाश में होम्स के एक पूरे ईलाके में छापामारी की और मेरे बारे में पूछताछ करने के क्रम में कई लोगों को प्रताड़ित किया.

सुरक्षा कारणों से मैं अपनी वर्तमान स्थिति या परिवार के निर्णय पर अधिक नहीं बोल सकती हूँ लेकिन इतना ज़रूर कहूंगी कि अल्पसंख्यक समूहों में असंतुष्ट सदस्यों पर परिवार का बहुत दबाव होता है और इसी कारण परिवारों में टूट हो रही है.

अल जज़ीरा: सीरियाई सरकार के ख़िलाफ़ आपके रूख से अल्वाईत समुदाय के कितने लोग सहमति रखते हैं?
सुलिमान: अल्पसंख्यक समुदायों के बहुत से लोग सरकार के ख़िलाफ़ हैं. ऐसा विद्रोह की शुरुआत से पहले भी था. विरोधी पक्ष के महत्वपूर्ण लोगों पर नज़र डालिए. उनमें हर सम्प्रदाय और समूह के लोग हैं. राजधानी दमिश्क में हम सब विरोध-प्रदर्शन करते रहे हैं और दूसरों के प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया है.

स्वीदा (देश के दक्षिण में) या तर्तौस (पश्चिमी सीरिया) जैसे अन्य शहरों में, जहाँ अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी अधिक है, हालात बेहद ख़राब हैं. लोग सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठा सकते क्योंकि उनका दमन सुन्नियों की अपेक्षा अधिक भयावहता से होता है. सरकारी तंत्र उन्हें, उनके परिवार और बच्चों को विरोध से पहले ही धमका देता है.

अल्वाईत संप्रदाय में उसी तरह से सत्ता के समर्थक हैं जैसे कि अन्य सम्प्रदायों से हैं. लेकिन तानाशाही के अल्वाईत होने के कारण उसकी कारगुज़ारियों का सारा जिम्मा पूरे समुदाय पर थोप दिया जाता है.

अल जज़ीरा: ऐसा लगता है कि कई अल्वाईत इस उथल-पुथल में अपनी सुरक्षा को लेकर और असद के जाने पर अपनी स्थिति को लेकर आशंकित हैं. सरकार-समर्थित मीडिया से और कभी-कभी विरोधी नेताओं से ऐसी सूचनाएं आती हैं कि होम्स के अल्वाईत-बहुल ईलाकों में हथियारबंद गिरोह हत्या और अपहरण जैसी वारदातें कर रहे हैं. उन्हें इस विद्रोह के परिणामों से चिंतित क्यों नहीं होना चाहिए?
सुलिमान: यह महत्वपूर्ण सवाल है. मैं इसका बेबाक जवाब देना चाहूंगी क्योंकि मुझे कोई परवाह नहीं है. होम्स में सरकार द्वारा अल्पसंख्यक-बहुल ईलाकों में 200 सदस्यों का सुरक्षा दस्ता तैनात किया गया. इन्होंने लोगों की हत्याएं कर दूसरे ईलाकों में लाशें फेंक दीं ताकि सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाया जा सके. हमारे पास इसके सबूत हैं और हमने इन अपराधियों के बारे में लोगों को लगातार आगाह किया है.

इस तानाशाही ने अल्पसंख्यकों को दशकों से धोखा दिया है. असद के पिता हाफ़िज़ अल-असद ऐसा जताते थे कि वे अल्पसंखयकों के रक्षक हैं. 1980 के दशक में उनकी सेना ने मुस्लिम ब्रदरहुड की मौजूदगी का छलावा देकर हामा शहर पर हमला किया था. हाफ़िज़ ने घरों को बरबाद किया, हत्याएं की, और अल्पसंख्यकों को यह भरोसा दिलाया कि अगर वह देश के राष्ट्रपति नहीं रहते तो मुस्लिम ब्रदरहुड ने इस्लामी राज स्थापित कर लिया होता.

अल जज़ीरा: राष्ट्रपति असद ने हाल के एक साक्षात्कार में कहा कि सीरिया में महा-अरबियत और इस्लामवाद के बीच संघर्ष है. इस्लामवादियों द्वारा सीरिया का शासन चलाये जाने से आप भयभीत नहीं हैं?
सुलिमान:
अगर सीरिया के लोग लोकतान्त्रिक तरीके से निर्णय लेते हैं कि उन्हें इस्लामवादियों द्वारा शासित होना होना है तो यह उनका निर्णय है. मैं इस्लामवादियों की सरकार से भयभीत नहीं हूँ क्योंकि अगर आप सीरिया की सड़कों पर घूमेंगे तो आप पाएंगे कि यहाँ इस्लाम कभी भी कठोर या अतिवादी नहीं रहा है. सरकारी मीडिया सीरिया में मुसलमानों की छवि को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश कर रहा है.

अल जज़ीरा: सीरिया में गृहयुद्ध की आशंका के बारे में कुछ दिनों से बयान आ रहे हैं. क्या आप इससे सहमत हैं? सीरिया को किस दिशा में जाता हुआ आप देख रही हैं?
सुलिमान:
गृहयुद्ध की कोई सम्भावना नहीं है. तानाशाही अपनी मौजूदगी और अपने दमन तथा हत्याओं को उचित ठहराने के हर हथकंडे अपनायेगी.

आप सड़कों पर जाकर सीरियाई लोगों की परिपक्वता का अन्दाज़ा लगा सकते हैं. उन्हें पता है कि उनकी परेशानी दूसरे सम्प्रदाय से नहीं, बल्कि इस सत्ता और लोगों के खून से सने हाथों से है. आपको समझाना होगा कि सीरियाई गुप्तचर तंत्र से जुड़े लोग हर समुदाय से हैं.

सीरिया में गृहयुद्ध से बचने के लिये इस शासन के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को गंभीर कदम उठाने चाहिए. अभी तक उनकी कथनी को हमने करनी में बदलते नहीं देखा है. मैंने अपनी आँखों से प्रदर्शन में शामिल पच्चीस साल के एक युवक की हत्या होते देखा है. सत्ता लगातार हत्याएं कर रही है क्योंकि उसे अन्तरराष्ट्री समुदाय की कोशिशों में गंभीरता नहीं दीख रही.

मैं सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप नहीं, बल्कि मानवीय चिंताओं से प्रेरित कठोर और ईमानदार कोशिश चाहती हूँ जो देशों के अपने स्वार्थों से प्रेरित न हों.

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