बी आर चोपड़ा का सफ़र- भाग पांच/ प्रकाश के रे

वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के ब्लॉग के लिये मैं बी आर चोपड़ा पर एक सिरीज़ लिख रहा हूँ.

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बी आर चोपड़ा एवं यश चोपड़ा. बी आर के बेटे रवि चोपड़ा (पीछे)

बी आर चोपड़ा के साथ आगे बढ़ने से पहले 1950 के दशक में फ़िल्म-उद्योग की दशा का जायजा ले लिया जाये. 1951 में सरकार द्वारा गठित फ़िल्म जांच आयोग ने फ़िल्म-उद्योग में व्याप्त अराजकता के ख़ात्मे के लिये एक परिषद् बनाने की सिफ़ारिश की थी. कहा गया कि यह केन्द्रीय परिषद् सिनेमा से संबंधित हर बात को निर्धारित करेगा. लेकिन इस दिशा में कुछ भी नहीं हो पाया और पुरानी समस्याओं के साथ नयी समस्याओं ने भी पैर पसारना शुरू कर दिया. स्टार-सिस्टम भी इन्हीं बीमारियों में एक था. आम तौर पर स्टार मुख्य कलाकार होते थे, लेकिन कुछ गायक और संगीतकार भी स्टार की हैसियत रखते थे. ये स्टार फ़िल्म के पूरे बजट का आधा ले लेते थे. तत्कालीन फ़िल्म उद्योग पर विस्तृत अध्ययन करनेवाले राखाल दास जैन के अनुसार 1958 आते-आते स्टार 1955 के अपने मेहनताने का तीन गुना लेने लगे थे. हालत यह हो गयी थी कि बिना बड़े नामों के फिल्में बेचना असंभव हो गया था और वितरकों को आकर्षित करने के लिये निर्माता महत्वाकांक्षी फिल्में बनाने की घोषणा करने लगे थे. इस स्थिति के प्रमुख कारण थे- स्वतंत्र निर्माताओं की बढ़ती संख्या, काले धन की भारी आमद, बॉक्स-ऑफिस का दबाव. हालांकि स्टारडम के पीछे के सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारकों को भी हमें नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए.

एक तरफ स्टार मालामाल हो रहे थे, वहीं फ़िल्म-निर्माण से जुड़े अन्य कलाकारों और तकनीशियनों को नाम-मात्र का मेहनताना दिया जाता था. 1956 की फरवरी में जूनियर कलाकारों ने काम रोकने के साथ राज कपूर, सत्येन बोस, श्याम किशोर साहू जैसे बड़े निर्माताओं के घरों के सामने भूख हड़ताल भी की थी. अख्तर मिर्ज़ा, जिन्होंने नया दौर लिखा था, ने कहा था कि कहानी लिखने वाला क्रेडिट और मेहनताने के मामले में कोई औक़ात नहीं रखता. 1958 में जब संगीत से जुड़े कलाकारों ने अधिक पैसे की मांग की तो निर्माताओं ने कुछ दिनों के लिये रेकॉर्डिंग ही बंद कर दिया. उधर निर्माताओं की शिकायत थी कि वितरक और सिनेमा हॉल के मालिक फ़ायदे का बड़ा हिस्सा ले जाते हैं, किन्तु नुक़सान निर्माताओं पर थोप देते हैं. क़र्ज़ देनेवाले पचास फ़ीसदी तक सूद वसूलते थे. कुछ बाहरी मुसीबतें भी थीं. सेंसर का बड़ा दबाव था. हद तो तब हो गयी जब ऑल इण्डिया रेडियो ने फिल्मी गाने बजाने बंद कर दिए. फ़िल्म के रील तब विदेशों से आयात होते थे और निर्धारित मात्र में ही निर्माताओं को उनकी आपूर्ति की जाती थी. इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता था और छोटे-मझोले निर्माता इसके सबसे बड़े पीड़ित थे. बी आर चोपड़ा ने तब इसे स्टारडम से भी बड़ी मुसीबत बताया था और इन परेशानियों के बारे में पत्रिकाओं में लगातार लिखा भी था. इन लेखों में चोपड़ा ने फ़िल्म-निर्माण के लिये बेहतर स्थिति बनाने की ज़रुरत पर ज़ोर दिया था.

फ़िल्म-उद्योग की ऐसी हालत में चोपड़ा ने जैसे-तैसे ज़रूरी धन का जुगाड़ किया और एक ही रास्ता की शूटिंग शुरू कर दी. इसमें मुख्य कलाकार अशोक कुमार, मीना कुमारी और जीवन थे. अशोक कुमार की सलाह पर चोपड़ा ने नवोदित सुनील दत्त को मौका दिया था. तब तक उनकी कोई फ़िल्म प्रदर्शित नहीं हुयी थी. विधवा विवाह के विषय पर बनी इस फ़िल्म की कहानी पण्डित मुखराम शर्मा ने लिखी थी. हेमंत कुमार ने संगीत दिया था और गाने लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी ने. यह फ़िल्म १९५६ में प्रदर्शित हुई और उस साल की सबसे कामयाब फ़िल्मों में थी. मशहूर फ़िल्मी पत्रिका फ़िल्म इण्डिया ने लिखा था कि फ़िल्म बॉक्स-ऑफिस को ध्यान में रख कर बनायी गयी है लेकिन इसकी समझदारी भरे विषय-वस्तु के लिये इसकी सराहना की जानी चाहिए.

(अगले हफ़्ते ज़ारी)




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