बहसतलब (दो): मोहल्‍ला लाइव, यात्रा बुक्‍स और जनतंत्र का आयोजन

दिल्ली में यूँ तो रोज़ाना अनेक गोष्ठियां अनेक विषयों पर होती रहती हैं, लेकिन ऐसी गोष्ठियां कभी-कभार ही होती हैं जिनमें विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी, विशेषज्ञ, पेशेवर, कार्यकर्ता आदि एक साथ किसी एक मुद्दे पर अपना नज़रिया पेश करते हों. शुक्रवार की शाम दक्षिण दिल्ली के हैबिटैट सेंटर में ऐसी ही एक गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें ‘अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों में आम आदमी’ विषय पर चर्चा हुई. वक्ताओं में स्वनामधन्य नामवर सिंह (साहित्य), त्रिपुरारी शर्मा (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय/रंगमंच), अरविन्द मोहन (पत्रकारिता), अजय ब्रह्मात्‍मज (फ़िल्म समीक्षक) और अनुराग कश्यप (फिल्मकार) शामिल थे. डेढ़ घंटे चली इस चर्चा को समाचार-साहित्य की हिंदी वेब साईटों – मोहल्ला लाईव एवं जनतंत्र, और पेंग्विन की सहयोगी संस्था- यात्रा बुक्स ने बहसतलब श्रृंखला के तहत आयोजित किया था. यह गोष्ठी इस श्रृंखला की द्वितीय कड़ी थी.


आयोजकों की तरफ से आमंत्रण में कहा गया था कि अभिव्यक्ति के तमाम माध्यम आज बाज़ार की चाकरी कर रहे हैं और उन्हें आम आदमी से कोई सरोकार नहीं है जिसकी बुनियाद पर लोकतंत्र की इमारत खड़ी है. उन्होंने सवाल किया था कि क्या इन माध्यमों की सरहद से बाहर जा चुके इस आम आदमी की वापसी हो पायेगी. मेरे विचार में यह एक अतिवादी धारणा है लेकिन आम आदमी और उसकी चिंताओं को चिंतन और सृजन के केंद्र में लाने तथा माध्यमों की व्यापक जिम्मेदारी को यह धारणा रेखांकित भी करती है. इस लिहाज़ से यह गोष्ठी एक महत्वपूर्ण पहल मानी जानी चाहिए और इसी वज़ह से बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें शिरकत की. लेकिन निराशाजनक पहलू यह है कि वक्ता बिना किसी तैयारी के आए थे और सतही बातों के अलावा कोई समझदारी बनाने वाली बातचीत नहीं हो पाई.


फ़िल्म लेखन और निर्देशन के नए तेवर की बदौलत अपना स्थान बना चुके अनुराग कश्यप फ़िल्म निर्माण, वितरण और प्रदर्शन के अर्थतंत्र की भयावहता को गिना रहे थे और बता रहे थे कि बाज़ार के चंगुल से मुक्ति लगभग असंभव है. उनके अनुसार फ़िल्मकारों पर यह दबाव रहता है कि वह तीन दिनों के भीतर अपनी लागत और मुनाफ़ा बटोर ले क्योंकि चौथे ही दिन लोगों के पास इन्टरनेट या पाईरेटेड सीडी की कृपा से फ़िल्म पहुँच जायेगी. अनुराग कह रहे थे कि हम पाईरेटेड या डाउनलोड कर फ़िल्में देख वैसे फ़िल्मकारों का नुकसान कर रहे हैं जो कुछ अच्छा कर सकते हैं. वैसे जाते जाते उन्होंने यह भी कह दिया कि दर्शकों की रूचि को अभी परिष्कृत होना है- ‘यदि एक थियेटर में सामाजिक मुद्दे पर बनी फ़िल्म लगी हो और बगल वाले सिनेमा घर में कैटरीना कैफ़ की फ़िल्म लगी हो तो आम आदमी दूसरे सिनेमा घर जाएगा’. नामवर सिंह यूँ तो बोलने के लिये
पिछले कई वर्षों से जाने जाते हैं (माने भी जाते हैं), लेकिन इस गोष्ठी में वे बमुश्किल दो मिनट बोले और बताया कि रचना में आम चरित्र ख़ास हो जाता है और हो जाना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता तो वह कमज़ोर रचना मानी जायेगी. नामवर जी जैसे धाकड़ विद्वान से लगभग बेमतलब की बात सुन कर खीझ सी हुई. इस कैफीयत को परवान दिया वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन ने. कहने लगे अखबार की लागत बहुत ज्यादा होती है इसीलिए हमारे पास विज्ञापनों पर निर्भरता और उनसे निर्देशित होने के लिये विवश हैं. अनुराग की तरह अपनी कमजोरी का ठीकरा समाज पर फोड़ते गए कि जब समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे. हालांकि उन्होंने इतना भलापन (भोलापन!!) ज़रूर दिखाया कि आम आदमी मीडिया के धोखे में नहीं आता.


त्रि
पुरारी शर्मा जी ने कहा रंग-कर्म सबसे पुराना माध्यम है और वह बुनियादी रूप से हाशिये के लोगों का माध्यम है. चूँकि थियेटर में बाज़ार-वाणिज्य का वह दखल अभी तक नहीं हो पाया है जैसा कि अन्य माध्यमों में है इसलिए उसके बारे में अन्य माध्यमों की तरह बात नहीं कर सकते. गोष्ठी के अंतिम वक्ता थे फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज और वही कुछ तैयारी से बोले रहे थे. फ़िल्म-व्यवसाय के बदलते स्वरुप का बयान करते हुए वह बम्बईया सिनेमा के सरोकारों के बदलने का विवरण दे रहे थे. बड़े शहरों और विदेश में रह रहे भारतीयों को केंद्र में रख कर फ़िल्में बनाई जा रही हैं क्योंकि धन की तुरंत वसूली वहीँ से हो रही है. उनके हिसाब से यह एक बड़ा कारण है जिसकी वज़ह से गाँव, क़स्बा और पीछे छूट गया आदमी सिनेमा से दरकिनार है.


वक्ताओं के बोलने के बाद श्रोताओं की बारी थी और उन्होंने कई सवाल
पूछे. सबसे ज्यादा सवाल अनुराग के खाते में गए और उनसे कुछ कम अजय जी से पूछे गए. नामवर जी और अरविन्द मोहन से नहीं के बराबर सवाल हुए जिस पर उन्हें सोचना चाहिए. त्रिपुरारी जी से सवाल नहीं पूछे गए क्योंकि ज़्यादातर श्रोता थियेटर की गतिविधियों से परिचित नहीं थे और इसे हम सब को एक चिंता के रू लेना चाहिए. सिनेमा पर सवालों की बौछार इस बात को एक बार फिर रेखांकित कर गयी कि सिनेमा की लोकप्रियता और उसको लेकर हिंदी लोकवृत्त में रूचि/चिंता काफी गहरी है.


मेरे विचार से आयोजकों को ‘आम आदमी’ जैसी अवधारणायें स्पष्टता से रखनी चाहिए और वक्ताओं को विषय और बहस के सरोकारों से आगाह कर देना चाहिए. एक सलाह और कि बड़े और भीड़जुटाऊ नामों की जगह ज़रूरी नामों को आमंत्रित किया जाये. बहस का विषय व्यापक रखने से बहस का स्तर निर्धारित नहीं होता. इसके लिये ज़रूरी हैं-  गंभीरता, ताज़गी और सरोकार. बहसतलब के दोनों कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी ने हिंदी लोकवृत के न सिर्फ़ जीवंत होने का प्रमाण है, बल्कि उसकी बहस के केंद्र में राजनीति और साहित्य के साथ अन्य क्षेत्रों के आने और जमने की सूचना भी है. बहसतलब के अगले आयोजन का इंतज़ार है.

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